Teacher Promotion:शिक्षक पदोन्नति…स्कूल शिक्षा विभाग की ड्राइविंग सीट पर बैठे प्रशासनिक अधिकारी….!यहां पुलिस का क्या काम… ?

Teacher Promotion(मनीष जायसवाल)।सोमवार को जिले के सहायक शिक्षकों की प्राथमिक स्कूल के प्रधान पाठक के पद पदोन्नति की प्रक्रिया पूरी हो गई।
पदोन्नति की प्रकिया में किसी प्रकार की गड़बड़ी नहीं हो इसे लेकर जिला प्रशासन की ओर से एक एडिशनल कलेक्टर को जिला शिक्षा विभाग की ड्राइविंग सीट पर बिठा दिया गया। राजस्व विभाग की कमीज को साफ और स्कूल शिक्षा विभाग की कमीज को दागदार समझने के इस ओवर कांफिडेंस का नतीजा यह हुआ कि अब शिक्षक पदोन्नति एक्प्रेस का वाहन सड़क से उतरता हुआ दिखाई दे रहा है..।
अब इस पदोन्नति में कई विवाद जुड़ गए है। असंतुष्ट अब जन प्रतिनिधियों से मुलाकात कर फिर से काउंसलिंग कराने की मांग को लेकर मिलने वाले है ।वही इनकी बाते अगर नहीं सुनी गई तब ये शिक्षक कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे है..!
शिक्षा विभाग की भूमिका
सहायक शिक्षक की प्राथमिक स्कूल के प्रधान पाठक के पद पर हुई पदोन्नति की प्रक्रिया में जिला शिक्षा अधिकारी सहित विभाग की टीम इस पदोन्नति एक्प्रेस में ड्राइविंग सीट की जगह सहयोगी की भूमिका में नजर आई । जिला शिक्षा विभाग की ओर से जो पदोन्नति को लेकर फॉर्मेट क्रम तैयार किया गया था उसका उल्टा फॉर्मेट क्रम इस पदोन्नति के दौरान नजर आया ।जिसको लेकर शिक्षक नाराज रहे। यहां पदोन्नति की काउंसलिंग कम दबाव पूर्वक पदस्थापना अधिक लग रही थी।
शिक्षक पदोन्नति में पुलिस
स्कूल शिक्षा विभाग में भर्ती, पदोन्नति, दावा आपत्ति , दस्तावेज सत्यापन होते रहे हैं। कभी पुलिस बल की आवश्यकता जिले के शिक्षा अधिकारियों को या संभागीय संयुक्त संचालकों को नहीं पड़ी। लेकिन महारानी लक्ष्मी बाई स्कूल में जिले के सहायक शिक्षक की प्राथमिक स्कूल के प्रधान पाठक के पद पदोन्नति की प्रक्रिया में जिला पुलिस बल की उपस्थिति चर्चा का विषय बनी रही।
विवाद का यह है मामला
मिलीं जानकारी के मुताबिक शिक्षको की पदोन्नति में सबसे पहले दिव्यांग शिक्षकों प्रकिया शामिल किया गया। इसके बाद शिक्षक विहीन 14 स्कूलों में पदोन्नति के लिए काउंसलिंग में आए । शिक्षकों को खुला ऑफर दिया गया। इसके बाद एकल शिक्षकीय शालाओं के लिए भी ऑफर दिया गया।
लेकिन शिक्षक विहीन और एकल शिक्षकीय स्कूलों में जाने को लेकर बहुत से शिक्षकों ने इंकार कर दिया। वही इस पदोन्नति में महिला शिक्षकों को प्राथमिकता देते हुए दो चरण के हिसाब से काउंसलिंग में स्कूल चयन करने का अवसर दिया गया। फिर पदोन्नति में शामिल शिक्षकों की सूची में निचले क्रम से पुरुष शिक्षकों को विभिन्न शालाओं में पदांकन करने का आदेश बताया गया ।
उसके बाद दूसरे क्रम में निचले क्रम से ही शेष बचे शिक्षकों को एकल शिक्षक की स्कूलों में पदाकिंत किया गया। चौथे राउंड में भी दिव्यांग शिक्षको की पोस्टिंग करने के बाद घोषणा की गई कि काउंसलिंग समाप्त हो गई।इस दौरान वहां कम से कम 40 से 50 शिक्षक बैठे रह गये।
काउंसलिंग करा रहे संचालक ने खडे होकर बताया कि जो शिक्षक विहीन में नीचे से 7 कर्मचारी उसके बाद आवश्यकता वाली स्कूलों में करीब 29 शिक्षको को बिना काउंसलिंग के दे दिया गया । उसके बाद विरोध होने लगा । आखिर में बिना काउंसलिंग के उन शिक्षको को पदाकिंत किया गया ।लेकिन जो शिक्षक पदोन्नति नही लेना चाहते थे ।उनको बचे हुए कुछ खास जगह में नाम लिखकर भर दिया गया।
शिक्षा विभाग में प्रशासन के दखल पर सवाल
बिलासपुर में हुई छोटी सी पदोन्नति अपने साथ विवाद लाते हुए शिक्षा विभाग में मौजूद रीति, नीति और अनुभवी अधिकारियों को दर किनार कर प्रशासनिक अधिकारियों की दखलअंदाजी पर बिलासपुर से लेकर संचालनालय और मंत्रालय में शिक्षा व्यवस्था के संचालन में बैठे गैर शिक्षकीय प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका पर सवाल खड़े करती हुई नजर आ रही है …!
आम सी धारणा है कि प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हो या फिर आईएस अफसर हो इनका… औरा कुछ ऐसा होता है.. कि स्कूल शिक्षा विभाग की जड़ों से जुड़े अधिकारी इनके समाने अपना मत नहीं रख पाते है..! इनके निर्णयों पर चुपचाप सिर्फ हामी ही भरते रहे है।यही वजह है बहुत ही योजनाएं और निर्णय बेतुके और जमीनी हकीकत को ध्यान में रखकर नहीं लिए जाते।इस विभाग के बीते कई निर्णय संकेत भी देते है। ओरे और पद के रुतबे के चलते बात मुलाकात में शिक्षक संघ और शिक्षको के विरोध के सुर दबा दिए जाते है। जैसा बिलासपुर में हुआ..!
ताजा घटना क्रम में बीएड डीएड विवाद की मुख्य वजह भी कही न कही स्कूल शिक्षा विभाग के गैर अनुभवी प्रशासनिक अधिकारी की बड़ी भूमिका भी रही होगी ।
समय रहते अगर अधिकारी डीएड धारी अभ्यर्थियों की बात मना लिए होते तो वर्तमान की सरकार के सामने आज बार-बार न्यायालय के अवमानना की स्थिति नहीं आती। अनिर्णय की स्थिति में सरगुजा और बस्तर के बीएड किए हुए सहायक शिक्षक और डीएड किए हुए अभ्यर्थी दोनों को 14 महीने का वनवास नहीं देखना पड़ता।
चर्चा में यह बात आम है कि बिलासपुर में हुई पदोन्नति में शामिल प्रशासन के अधिकारी यह नहीं समझ पाए कि पदोन्नति लेना और नहीं लेना शिक्षक पर निर्भर है …….।
Teacher Promotion/यह जबरदस्ती थोपी नहीं जा सकती। जबकि आम सी बात यह है कि किसी आवश्यकता वाली जगह पर किसी भी शिक्षक को पदांकन के लिए नियोक्ता प्रशासनिक आधार पर ही राज्य शासन की नीतियों के तहत हुए आदेश पर ट्रांसफर कर सकता है। व्यवस्था के तहत जबरदस्ती नहीं भेजा जा सकता ।सिर्फ अस्थाई व्यवस्था बनाई जा सकती है। इस बात में दो मत नहीं कि राज्य में नई शिक्षक भर्ती नहीं होने और वर्तमान सरकार का शिक्षकों के युक्ति युक्तिकरण से पीछे हटने की वजह से शिक्षकों की पदोन्नति के बाद निचले क्रम के स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था पहले से कमजोर सी लगती है।






